280+ Tanhai Shayari In Hindi 2025
ज़िंदगी में कभी ऐसे लम्हे भी आते हैं जब भीड़ में रहकर भी इंसान अकेलापन महसूस करता है। तन्हाई दिल को चुपचाप बहुत कुछ सिखा देती है और कई अनकहे जज़्बात बाहर लाती है। Tanhai Shayari In Hindi इन्हीं एहसासों को अल्फ़ाज़ों में ढालकर दिल तक पहुंचाती है। इस लेख में आपको मिलेंगी ऐसी शायरियां जो अकेलेपन के दर्द, खामोशी और गहरी भावनाओं को खूबसूरती से बयान करती हैं। इन्हें पढ़कर आप अपने दिल के बोझ को हल्का कर पाएंगे और तन्हाई में छिपी संवेदनाओं को महसूस करेंगे।
Tanhai Shayari In Hindi
इतने घने बादल के पीछे
कितना तन्हा होगा चाँद
मैं हूँ दिल है तन्हाई है
तुम भी होते अच्छा होता
ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
क़ाफ़िला साथ और सफ़र तन्हा

ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है
ऐसी तन्हाई कि मर जाने को जी चाहता है
अब तो उन की याद भी आती नहीं
कितनी तन्हा हो गईं तन्हाइयाँ
अपने होने का कुछ एहसास न होने से हुआ
ख़ुद से मिलना मिरा इक शख़्स के खोने से हुआ
अब इस घर की आबादी मेहमानों पर है
कोई आ जाए तो वक़्त गुज़र जाता है
मुझे तन्हाई की आदत है मेरी बात छोड़ें
ये लीजे आप का घर आ गया है हात छोड़ें
एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक
जिस को भी पास से देखोगे अकेला होगा
तन्हाई में करनी तो है इक बात किसी से
लेकिन वो किसी वक़्त अकेला नहीं होता
माँ की दुआ न बाप की शफ़क़त का साया है
आज अपने साथ अपना जनम दिन मनाया है
अपने साए से चौंक जाते हैं
उम्र गुज़री है इस क़दर तन्हा
इक सफ़ीना है तिरी याद अगर
इक समुंदर है मिरी तन्हाई
किसी हालत में भी तन्हा नहीं होने देती
है यही एक ख़राबी मिरी तन्हाई की
काव काव-ए-सख़्त-जानी हाए-तन्हाई न पूछ
सुब्ह करना शाम का लाना है जू-ए-शीर का
शहर में किस से सुख़न रखिए किधर को चलिए
इतनी तन्हाई तो घर में भी है घर को चलिए
मुसाफ़िर ही मुसाफ़िर हर तरफ़ हैं
मगर हर शख़्स तन्हा जा रहा है
तन्हाइयाँ तुम्हारा पता पूछती रहीं
शब-भर तुम्हारी याद ने सोने नहीं दिया
मैं अपने साथ रहता हूँ हमेशा
अकेला हूँ मगर तन्हा नहीं हूँ
है आदमी बजाए ख़ुद इक महशर-ए-ख़याल
हम अंजुमन समझते हैं ख़ल्वत ही क्यूँ न हो
Akelepan ki Shayari
ये किस मक़ाम पे लाई है मेरी तन्हाई
कि मुझ से आज कोई बद-गुमाँ नहीं होता
भीड़ तन्हाइयों का मेला है
आदमी आदमी अकेला है
ज़रा देर बैठे थे तन्हाई में
तिरी याद आँखें दुखाने लगी

ईद का दिन है सो कमरे में पड़ा हूँ ‘असलम’
अपने दरवाज़े को बाहर से मुक़फ़्फ़ल कर के
दश्त-ए-तन्हाई में जीने का सलीक़ा सीखिए
ये शिकस्ता बाम-ओ-दर भी हम-सफ़र हो जाएँगे
ये इंतिज़ार नहीं शम्अ है रिफ़ाक़त की
इस इंतिज़ार से तन्हाई ख़ूब-सूरत है
तेरे जल्वों ने मुझे घेर लिया है ऐ दोस्त
अब तो तन्हाई के लम्हे भी हसीं लगते हैं
कोई भी घर में समझता न था मिरे दुख सुख
एक अजनबी की तरह मैं ख़ुद अपने घर में था
दे हौसले की दाद के हम तेरे ग़म में आज
बैठे हैं महफ़िलों को सजाए तिरे बग़ैर
कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता
तुम न होते न सही ज़िक्र तुम्हारा होता
शोर दिन को नहीं सोने देता
शब को सन्नाटा जगा देता है
मकाँ है क़ब्र जिसे लोग ख़ुद बनाते हैं
मैं अपने घर में हूँ या मैं किसी मज़ार में हूँ
हम अपनी धूप में बैठे हैं ‘मुश्ताक़’
हमारे साथ है साया हमारा
तुम से मिले तो ख़ुद से ज़ियादा
तुम को अकेला पाया हम ने
किस क़दर बद-नामियाँ हैं मेरे साथ
क्या बताऊँ किस क़दर तन्हा हूँ मैं
वो नहीं है न सही तर्क-ए-तमन्ना न करो
दिल अकेला है इसे और अकेला न करो
मैं सोते सोते कई बार चौंक चौंक पड़ा
तमाम रात तिरे पहलुओं से आँच आई
सारी दुनिया हमें पहचानती है
कोई हम सा भी न तन्हा होगा
भीड़ के ख़ौफ़ से फिर घर की तरफ़ लौट आया
घर से जब शहर में तन्हाई के डर से निकला
इक आग ग़म-ए-तन्हाई की जो सारे बदन में फैल गई
जब जिस्म ही सारा जलता हो फिर दामन-ए-दिल को बचाएँ क्या
हिचकियाँ रात दर्द तन्हाई
आ भी जाओ तसल्लियाँ दे दो
तन्हाई के लम्हात का एहसास हुआ है
जब तारों भरी रात का एहसास हुआ है
कमरे में मज़े की रौशनी हो
अच्छी सी कोई किताब देखूँ
जम्अ करती है मुझे रात बहुत मुश्किल से
सुब्ह को घर से निकलते ही बिखरने के लिए
दिन को दफ़्तर में अकेला शब भरे घर में अकेला
मैं कि अक्स-ए-मुंतशिर एक एक मंज़र में अकेला
अकेलापन शायरी
बना रक्खी हैं दीवारों पे तस्वीरें परिंदों की
वगर्ना हम तो अपने घर की वीरानी से मर जाएँ
हिज्र ओ विसाल चराग़ हैं दोनों तन्हाई के ताक़ों में
अक्सर दोनों गुल रहते हैं और जला करता हूँ मैं
दिल दबा जाता है कितना आज ग़म के बार से
कैसी तन्हाई टपकती है दर ओ दीवार से
तन्हाई की ये कौन सी मंज़िल है रफ़ीक़ो
ता-हद्द-ए-नज़र एक बयाबान सा क्यूँ है
अकेला-पन है और ऐसा अकेला-पन जिस में
कोई जो पूछ ले कुछ सब बताने लगते हैं
ग़म का साथी कौन है ये सोच कर तन्हा था मैं
साथ लेकिन मेरे ‘नश्तर’ रो रही थी चाँदनी
वही अकेला है अंजुमन में
वही है तन्हा मकान में भी
अलम-बरदार तन्हाई था अपना ‘फ़रहत-एहसास’
हुजूम-ए-शहर के हाथों जो मारा जा रहा है
‘कैफ़’ कहते हैं नासेह कि तन्हा रहो
मैं ख़ुदा तो नहीं हूँ जो यकता रहूँ
तन्हाई से आती नहीं दिन रात मुझे नींद
या-रब मिरा हम-ख़्वाब ओ हम-आग़ोश कहाँ है
कोई क्या जाने कि है रोज़-ए-क़यामत क्या चीज़
दूसरा नाम है मेरी शब-ए-तन्हाई का
ख़मोशी के हैं आँगन और सन्नाटे की दीवारें
ये कैसे लोग हैं जिन को घरों से डर नहीं लगता
मिरे घर में तो कोई भी नहीं है
ख़ुदा जाने मैं किस से डर रहा हूँ
शहर की भीड़ में शामिल है अकेला-पन भी
आज हर ज़ेहन है तन्हाई का मारा देखो
उन की हसरत भी नहीं मैं भी नहीं दिल भी नहीं
अब तो ‘बेख़ुद’ है ये आलम मिरी तंहाई का
मैं तो तन्हा था मगर तुझ को भी तन्हा देखा
अपनी तस्वीर के पीछे तिरा चेहरा देखा
सुब्ह तक कौन जियेगा शब-ए-तन्हाई में
दिल-ए-नादाँ तुझे उम्मीद-ए-सहर है भी तो क्या
दर-ओ-दीवार इतने अजनबी क्यूँ लग रहे हैं
ख़ुद अपने घर में आख़िर इतना डर क्यूँ लग रहा है
चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा
दिल मिला है कहाँ कहाँ तन्हा
किसी के बिन किसी की याद के बिन
जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो
देख कभी आ कर ये ला-महदूद फ़ज़ा
तू भी मेरी तन्हाई में शामिल हो
हम अंजुमन में सब की तरफ़ देखते रहे
अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला
अकेलापन शायरी 2 Line
अकेला उस को न छोड़ा जो घर से निकला वो
हर इक बहाने से मैं उस सनम के साथ रहा
दरवाज़े पर पहरा देने
तन्हाई का भूत खड़ा है
पुकारा जब मुझे तन्हाई ने तो याद आया
कि अपने साथ बहुत मुख़्तसर रहा हूँ मैं

यादों की महफ़िल में खो कर
दिल अपना तन्हा तन्हा है
कहाँ का वस्ल तन्हाई ने शायद भेस बदला है
तिरे दम भर के मिल जाने को हम भी क्या समझते हैं
ग़म ओ नशात की हर रहगुज़र में तन्हा हूँ
मुझे ख़बर है मैं अपने सफ़र में तन्हा हूँ
उदासियाँ हैं जो दिन में तो शब में तन्हाई
बसा के देख लिया शहर-ए-आरज़ू मैं ने
हर तरफ़ अपने ही अपने हाए तन्हाई न पूछ
किस क़दर खलती है अक्सर हम को बीनाई न पूछ
आज मौसम भी कुछ उदास मिला
आज तन्हाई भी अकेली है
ये कैसा क़ाफ़िला है जिस में सारे लोग तन्हा हैं
ये किस बर्ज़ख़ में हैं हम सब तुम्हें भी सोचना होगा
कितने चेहरे कितनी शक्लें फिर भी तन्हाई वही
कौन ले आया मुझे इन आईनों के दरमियाँ
बड़े बा-वफ़ा थे मिरे यार सब
मुसीबत में जब तक पुकारा न था
दरिया की वुसअतों से उसे नापते नहीं
तन्हाई कितनी गहरी है इक जाम भर के देख
तन्हाइयों को सौंप के तारीकियों का ज़हर
रातों को भाग आए हम अपने मकान से
गो मुझे एहसास-ए-तन्हाई रहा शिद्दत के साथ
काट दी आधी सदी एक अजनबी औरत के साथ
यूँ रात गए किस को सदा देते हैं अक्सर
वो कौन हमारा था जो वापस नहीं आया
मिरे वजूद को परछाइयों ने तोड़ दिया
मैं इक हिसार था तन्हाइयों ने तोड़ दिया
इस बुलंदी पे बहुत तन्हा हूँ
काश मैं सब के बराबर होता
मेरा कर्ब मिरी तन्हाई की ज़ीनत
मैं चेहरों के जंगल का सन्नाटा हूँ
तू मेरे साथ नहीं है तो सोचता हूँ मैं
कि अब तो तुझ से बिछड़ने का कोई डर भी नहीं
तन्हाई की दुल्हन अपनी माँग सजाए बैठी है
वीरानी आबाद हुई है उजड़े हुए दरख़्तों में
सर-बुलंदी मिरी तंहाई तक आ पहुँची है
मैं वहाँ हूँ कि जहाँ कोई नहीं मेरे सिवा
ज़मीं आबाद होती जा रही है
कहाँ जाएगी तन्हाई हमारी
रिश्ते अकेलापन शायरी
यादों के शबिस्तान में बैठा हुआ साइल
तन्हा जो नज़र आता है तन्हा नहीं होता
सिमटती फैलती तन्हाई सोते जागते दर्द
वो अपने और मिरे दरमियान छोड़ गया

किसी के होने न होने के बारे में अक्सर
अकेले-पन में बड़े ध्यान जाया करते हैं
नई नहीं है ये तन्हाई मेरे हुजरे की
मरज़ हो कोई भी है चारागर से डर जाना
तिरी यादों से महका है मेरी तन्हाई का आलम
क़यामत तक इन्हीं तन्हाइयाँ में डूबना चाहूँ
हवा की डोर में टूटे हुए तारे पिरोती है
ये तन्हाई अजब लड़की है सन्नाटे में रोती है
यादों का इक हुजूम था तन्हा नहीं थी मेरी ज़ात
ख़ुद-कलामी में हुई तमाम शब उन्हीं से बात
तमाम दिन के दुखों का हिसाब करना है
मैं चाहता हूँ कोई मेरे आस-पास न हो
उस ने इक बार तो झाँका भी था मुझ में लेकिन
उस से देखी न गई वुसअत-ए-तन्हाई मिरी
कहाँ से आई थी आख़िर तिरी तलब मुझ में
ख़ुदा ने मुझ को बनाया तो मैं अकेला था
कोई भी यक़ीं दिल को ‘शाद’ कर नहीं सकता
रूह में उतर जाए जब गुमाँ की तन्हाई
सहरा में आ निकले तो मालूम हुआ
तन्हाई को वुसअत कम पड़ जाती है
पंछी सारे पेड़ से उड़ जाएँगे
सहन में इक ख़ामुशी रह जाएगी
मैं किस से करता यहाँ गुफ़्तुगू कोई भी न था
नहीं था मेरे मुक़ाबिल जो तू कोई भी न था
तेरी यादे ज़हर सी छाई है
हर पल दिल को सताई है..!!!
ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है
ऐसी तन्हाई कि मर जाने को जी चाहता है..!!!
ए मेरे दिल कभी तीसरे की उम्मीद भी ना किया कर
सिर्फ तुम और मैं ही हैं इस दश्त ए तन्हाई में..!!!
रुला देती है तेरी बेवफाई
कभी हँसाती, कभी रुलाती है..!!!
कमल की दुनिया है साहब टाइम किसी के पास
नही लेकिन हर कोई यहां टाइम पास कर रहा है..!!!
मैं अपनी तन्हाई को
सरेआम लिखना चाहती हूं
मेरे महबूब तेरे दिये
जख्म को लिखना चाहती हूं.!!
रास्ते बंट गए मंजिलें
कहीं खो गई
उम्मीदों के समुंदर में
तकदीरे कहीं खो गई..!
तेरा साथ है हमसे कुछ
इस तरह छोड़कर जाना
मानो जैसे नदियो का बिन
पानी के सुखा रह जाना..!
वो पूछते है हमसे
मुश्किले बहुत है
जिंदगी की राहो में
क्या चल पाओगे तुम
कांटो से भरी राहो में..!
जिंदगी का राग पुराना याद आया
आज गुजरा हुआ जमाना याद आया
थम सी गई जिंदगी खयालो की बदहाली मे
वो रंग और गम मुझको दोबारा याद आया..!
गम भी बहुत है जिंदगी में
फिर भी खुश रहने का बहाना चाहिए
यह बड़ी-बड़ी इमारते हमे मत दिखाओ
हमे तो बस गंगा का किनारा चाहिए..!
मैं हूँ दिल है तन्हाई है
तुम भी होते अच्छा होता!
थकन टूटन उदासी ऊब तन्हाई अधूरापन
तुम्हारी याद के संग इतना लम्बा कारवाँ क्यूँ है !
मुझे तन्हाई की आदत है
मेरी बात छोडोए तुम बताओ कैसी हो !
ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
क़ाफ़िला साथ और सफ़र तन्हा!
किस से कहु अपनी तन्हाई का आलम
लोग चेहरे के हसी देखए बहुत खुश समझते हैं!
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कहीं पर शाम ढलती है कहीं पर रात होती है
अकेले गुमसुम रहते हैं न किसी से बात होती है
तुमसे मिलने की आरज़ू दिल बहलने नहीं देती
तन्हाई में आँखों से रुक.रुक के बरसात होती है।
अपने होने का कुछ एहसास न होने से हुआ
ख़ुद से मिलना मिरा इक शख़्स के खोने से हुआ!
खौफ अब खत्म हुआ सबसे जुदा होने का
अपनी तन्हाई में हम अब मसरूफ बहुत रहते हैं
तन्हाई की आग में कहीं जल ही न जाऊँ
के अब तो कोई मेरे आशियाने को बचा ले!
जिंदगी में अकेलापन शायरी
मेरी तन्हाई को मेरा शौक न समझना
बहुत प्यार से दिया है ये तोहफा किसी ने !
कोसते रहते हैं अपनी जिंदगी को उम्रभर
भीड़ में हंसते हैं मगर तन्हाई में रोया करते हैं!

मैं तन्हाई को तन्हाई में तन्हा कैसे छोड़ दूँ
इस तन्हाई ने तन्हाई में तनहा मेरा साथ दिए है!
अब इस घर की आबादी मेहमानों पर है
कोई आ जाए तो वक़्त गुज़र जाता है!
इश्क के नशे मे डूबे तो जाना हमने फ़राज़
के दर्द मे तन्हाई नही होती तन्हाई मे दर्द होता हैं!
अब तो याद भी उसकी आती नहीं
कितनी तनहा हो गई तन्हाईयाँ
मुझे तन्हाई की आदत है मेरी बात छोड़ें
ये लीजे आप का घर आ गया है हात छोड़ें!
कांटो सी चुभती है तन्हाई अंगारों सी सुलगती है
तन्हाई कोई आ कर हम दोनों को ज़रा हँसा दे मैं रोती
हूँ तो रोने लगती है तन्हाई!
शाम.ए तन्हाई में इजाफा बेचैनी
एक तेरा ख्याल न जाना एक दूसरा तेरा जवाब न आना!
अब तो उन की याद भी आती नहीं
कितनी तन्हा हो गईं तन्हाइयाँ!
ऐ सनम तू साथ है मेरे मेरी हर तन्हाई में
कोई गम नहीं की तुमने वफ़ा नहीं की
इतना ही बहुत है की तू शामिल है मेरी तबाही में।
इस तरह हम सुकून को महफूज़ कर लेते हैं
जब भी तन्हा होते हैं तुम्हें महसूस कर लेते हैं।
अपने साए से चौंक जाते हैं
उम्र गुज़री है इस क़दर तन्हा!
Main or Meri Tanhai Shayari
अपनी तन्हाई में खलल यूँ डालूँ सारी रात
खुद ही दर पे दस्तक दूँ और खुद ही पूछूं कौन!
यादों में आपके तन्हा बैठे हैं
आपके बिना लबों की हँसी गँवा बैठे हैं
आपकी दुनिया में अँधेरा ना हो
इसलिए खुद का दिल जला बैठे हैं।
इतने घने बादल के पीछे
कितना तन्हा होगा चाँद!
इन उदास कमरों केण्ण् कोनों की गीली तन्हाई
वक़्त की धूप के साथ सूख ही जायेगी!
किसी को प्यार की सच्चाई मार डालेगी
किसी को दर्द की गहराई मार डालेगी
मोहब्बत में बिछड़ के कोई जी नहीं सकता
और बच गया तो उसे तन्हाई मार डालेगी।
ये सर्द रात ये आवारगी ये नींद का बोझ
हम अपने शहर में होते तो घर चले जाते!

