180+ Manzil Shayari in Hindi | मंजिल शायरी 2025

Manzil Shayari

मंज़िल तक पहुंचने का सफर हमेशा आसान नहीं होता, इसमें ठोकरें भी मिलती हैं और रुकावटें भी। लेकिन जो लोग हार मानने की बजाय लगातार कोशिश करते रहते हैं, वही एक दिन अपने सपनों को सच कर दिखाते हैं। Manzil Shayari In Hindi इन्हीं हौसलों और जज़्बातों को अल्फ़ाज़ों में पिरोकर आपके दिल तक पहुंचाती है। इस लेख में आप पढ़ेंगे ऐसी शायरियां जो थके हुए मन को नया जोश देंगी और मंज़िल पाने के लिए आपकी हिम्मत को और मजबूत बनाएंगी।

Manzil Shayari in Hindi

मंजिल उन्हीं का इंतजार करती है
जो सही दिशा में मेहनत करते है..!!!

जो अपने रास्ते पर भरोसा रखते है
उनकी मंजिल हमेशा पास होती है..!!!

सफलता की दौड़ में अपनों को छोड़ आए है
मंजिल पाने की जिद में घर छोड़ आए है..!!!

है जिंदगी अब तो मुझे मंजिल का पता दे
उम्मीद छूट रही है मेरी मेरी इसे ढूंढते ढूंढते..!!!

मंजिल चाहे जो भी हो रास्ते में डर कैसा
सफर का हर कदम खुद को बेहतर बनाता है..!!!

Manzil Shayari in Hindi
Manzil Shayari in Hindi

ए जिंदगी मुश्किलों से कह दो
उलझा ना करे हमसे
हमें हर कोशिश से लड़ना आता है..!!!

मंजिल तो उन्हे मिलती है
जिनकी तकदीर अच्छी होती है
फूटी किस्मत वालों की नसीब में
तो गमों की बारिश होती है..!!!

मेरी पतंग भी तुम हो
उसकी ढील भी तुम
मेरी पतंग जहां कटकर गिरे
वह मंज़िल भी तुम !!

जमाना मेरी मंजिल की राह में कांटे बिछाता रहा
और मैं अपने जीत की तरफ कदम बढ़ाता रहा..!

अनजानी राहो का
सफर मुश्किल लगता है
राही जमाने के रंगो
से बेखबर लगता है..!

मुसाफिर को रास्ते के
पत्थर स्वयं ही हटाने होगे
खुद ही अपनी मंजिल की
तरफ कदम बढ़ाने होगे..!

ऐ मंजिल तुझे हासिल करके रहूंगा
अभी मैं चल रहा हूं पर ठहरा नही हूं..!

सफर बहुत लंबी होगी
रास्ते से मंजिल की दूरी होगी
मंजिल पर पहुंचेगा वही जिसकी
हर हाल में चलने की ज़िद होगी..!

मंजिल मिलने से दोस्ती भुलाई नहीं जाती
हमसफ़र मिलने से दोस्ती मिटाई नहीं जाती
दोस्त की कमी हर पल रहती है यार
दूरियों से दोस्ती छुपाई नहीं जाती !!

रास्ते मुश्किल है पर हम मंज़िल
ज़रूर पायेंगे
ये जो किस्मत अकड़ कर बैठी है इसे
भी ज़रूर हरायेंगे !!

हर सपने को अपनी साँसों में रखे
हर मंज़िल को अपनी बाहों में रखे
हर जीत आपकी ही है
बस अपने लक्ष्य को अपनी निगाहों में रखे !!

बेताब तमन्नाओ की कसक रहने दो
मंजिल को पाने की कसक रहने दो
आप चाहे रहो नज़रों से दूर
पर मेरी आँखों में अपनी एक
झलक रहने दो !!

मंज़िल का पता है न किसी
राहगुज़र का
बस एक थकन है कि जो
हासिल है सफ़र का !!

उल्फत में अक्सर ऐसा होता है
आँखे हंसती हैं और दिल रोता है
मानते हो तुम जिसे मंजिल अपनी
हमसफर उनका कोई और होता है !!

Manzil Shayari 2 Line

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया

किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा

जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा

सिर्फ़ इक क़दम उठा था ग़लत राह-ए-शौक़ में
मंज़िल तमाम उम्र मुझे ढूँढती रही

उक़ाबी रूह जब बेदार होती है जवानों में
नज़र आती है उन को अपनी मंज़िल आसमानों में

नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही

‘फ़ैज़’ थी राह सर-ब-सर मंज़िल
हम जहाँ पहुँचे कामयाब आए

कोई मंज़िल के क़रीब आ के भटक जाता है
कोई मंज़िल पे पहुँचता है भटक जाने से

उस ने मंज़िल पे ला के छोड़ दिया
उम्र भर जिस का रास्ता देखा

नहीं होती है राह-ए-इश्क़ में आसान मंज़िल
सफ़र में भी तो सदियों की मसाफ़त चाहिए है

वो क्या मंज़िल जहाँ से रास्ते आगे निकल जाएँ
सो अब फिर इक सफ़र का सिलसिला करना पड़ेगा

ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए
मंज़िल के लिए दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए

सब को पहुँचा के उन की मंज़िल पर
आप रस्ते में रह गया हूँ मैं

मुझे आ गया यक़ीं सा कि यही है मेरी मंज़िल
सर-ए-राह जब किसी ने मुझे दफ़अतन पुकारा

मेरी तक़दीर में मंज़िल नहीं है
ग़ुबार-ए-कारवाँ है और मैं हूँ

मंजिल शायरी 2 लाइन

हसरत पे उस मुसाफ़िर-ए-बे-कस की रोइए
जो थक गया हो बैठ के मंज़िल के सामने

एक मंज़िल है मगर राह कई हैं ‘अज़हर’
सोचना ये है कि जाओगे किधर से पहले

मंज़िलें गर्द के मानिंद उड़ी जाती हैं
वही अंदाज़-ए-जहान-ए-गुज़राँ है कि जो था

मंजिल शायरी 2 लाइन
मंजिल शायरी 2 लाइन

कोई मंज़िल आख़िरी मंज़िल नहीं होती ‘फ़ुज़ैल’
ज़िंदगी भी है मिसाल-ए-मौज-ए-दरिया राह-रौ

मंज़िल मिली मुराद मिली मुद्दआ मिला
सब कुछ मुझे मिला जो तिरा नक़्श-ए-पा मिला

मोहब्बत आप ही मंज़िल है अपनी
न जाने हुस्न क्यूँ इतरा रहा है

मंज़िल न मिली तो ग़म नहीं है
अपने को तो खो के पा गया हूँ

राहबर रहज़न न बन जाए कहीं इस सोच में
चुप खड़ा हूँ भूल कर रस्ते में मंज़िल का पता

मुझ को मंज़िल भी न पहचान सकी
मैं कि जब गर्द-ए-सफ़र से निकला

किस मंज़िल-ए-मुराद की जानिब रवाँ हैं हम
ऐ रह-रवान-ए-ख़ाक-बसर पूछते चलो

चला मैं जानिब-ए-मंज़िल तो ये हुआ मालूम
यक़ीं गुमान में गुम है गुमाँ है पोशीदा

न तो रंज-ओ-ग़म से ही रब्त है न ही आश्ना-ए-ख़ुशी हूँ मैं
मिरी ज़िंदगी भी अजीब है इसे मंज़िलों का पता नहीं

ख़ुद-बख़ुद राह लिए जाती है उस की जानिब
अब कहाँ तक है रसाई मुझे मालूम नहीं

चाँद है तेरा हम-सफ़र कोई नहीं है राहबर
आगे क़दम बढ़ा के रख दूर की रौशनी न देख

मंज़िल पे पहुँच सकते नहीं ऐसे मुसाफ़िर
हर गाम पे हो ख़ौफ़ जिन्हें आबला-पा का

पलट आता हूँ मैं मायूस हो कर उन मक़ामों से
जहाँ से सिलसिला नज़दीक-तर होता है मंज़िल का

तुम ख़ुद ही चले आओगे शायद सर-ए-मंज़िल
इक राह निकाली है मिरी दर-बदरी ने

फ़िक्र-ए-मंज़िल है न होश-ए-जादा-ए-मंज़िल मुझे
जा रहा हूँ जिस तरफ़ ले जा रहा है दिल मुझे

हम से मिलता है मंज़िलों का पता
और ख़ुद बे-निशान हैं हम लोग

रस्तों के पेच-ओ-ख़म ने कहीं और ला दिया
जाना हमें जहाँ था ये मंज़िल नहीं है वो

मैं सिदरत-उल-मुंतहा पे आ के रुकी हुई हूँ
अब आगे जो भी करेगा मेरा ख़ुदा करेगा

Manzil Quotes in Hindi

मंज़िले ख़ुद राह दिखाती है अग़र
ख़्वाहिश बुलन्द हो तो
खुदा की रहमत मंज़िल बन जाती है !!

रास्तों पर निगाह रखने वाले
भला मंज़िल कहाँ देख पाते हैं
मंज़िलों तक तो वही पहुँचते हैं
जो रास्तों को नज़रअंदाज़ कर जाते हैं !!

Manzil Quotes in Hindi
Manzil Quotes in Hindi

किस हद तक जाना है ये कौन जानता है
किस मंजिल को पाना है ये कौन जानता है
दोस्ती के दो पल जी भर के जी लो किस
रोज़ बिछड जाना है ये कौन जानता है !!

मंज़िल होगी आसमाँ ऐसा यकीं कुछ कम है
अपने नक्शे के मुताबिक़ ये ज़मीं कुछ कम है !!

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गये और कारवाँ बनता गया !!

ना किसी से ईर्ष्या ना किसी से कोई होड़
मेरी अपनी मंजीले मेरी अपनी दौड़ !!

इन उम्र से लम्बी सड़को को
मंज़िल पे पहुंचते देखा नहीं
बस दोड़ती फिरती रहती हैं
हम ने तो ठहरते देखा नहीं !!

किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा !!

जहाँ याद न आये तेरी वो तन्हाई किस काम की
बिगड़े रिश्ते न बने तो खुदाई किस काम की
बेशक़ अपनी मंज़िल तक जाना है हमें
लेकिन जहाँ से अपने न दिखें वो
ऊंचाई किस काम की !!

मंज़िल जुदा राहें जुदा फिर भी जुदा नहीं
वो चला गया पर क्यों मैं उससे ख़फा नहीं !!

एक ना एक दिन हासिल कर ही लूंगा मंज़िल
ठोकरे ज़हर तो नहीं जो खा कर मर जाऊंगा !!

मंज़िले हमारे करीब से गुज़रती गयी जनाब
और हम औरो को रास्ता
दिखाने में ही रह गये !!

Rasta Manzil Shayari

जो नज़रें रूकती नहीं ढूढंते
हुए मंज़िल-ए-अहम
उन नज़रों की गिरफ़्त में एक
ज़माना आज भी क़ैद हैं !!

ये राहें ले ही जाएँगी मंज़िल तक
हौसला रख
कभी सुना है कि अंधेरों ने
सवेरा ना होने दिया !!

सारे सितारे फ़लक से ज़मीं पर
जब उतर कें आयेंगे
फिर हम तेरी यादों के साथ रात
भर दिवाली मनायेंगे !!

अगर निगाहे हो मंज़िल पर और कदम हो राहो पर
ऐसी कोई राह नही जो मंज़िल तक ना जाती हो !!

You can also read Motivational Suvichar in Hindi

ये भी क्या मंज़र है बढ़ते हैं न रुकते हैं क़दम
तक रहा हूँ दूर से मंज़िल को
मैं मंज़िल मुझे !!

मैने इक माला की तरह तुमको
अपने आप मे पिरोया हैं
याद रखना टूटे अगर हम तो
बिखर तुम भी जाओगे !!

Manzil Shayari for Student

एक मंज़िल है मगर राह कई हैं
सोचना ये है कि जाओगे
किधर से पहले !!

सिर्फ़ इक क़दम उठा था ग़लत
राह-ए-शौक़ में
मंज़िल तमाम उम्र मुझे ढूँढती रही !!

उसे न चाहने की आदत उसे
चाहने का जरिया बन गया
सख्त था मैं लड़का अब प्यार
का दरिया बन गया !!

हौसले बुलंद रखो मंज़िल मिल ही जाएगी
काँटों पर चलने वालों को
फूलों की राह मिलेगी !!

मंज़िल तो मिल ही जायेगी भटक कर ही सही
गुमराह तो वो हैं जो घर से निकला ही नहीं !!

मंजिल उन्हीं को मिलती है
जिनके हौसलों में जान होती है
और और बंद भट्ठी में भी दारू उन्हीं को मिलती है
जिनकी भट्ठी में पहचान होती है !!

Meri Manzil Shayari

किसी को घर से निकलते ही
मिल गई मंजिल कोई हमारी
तरह उम्र भर सफ़र में आया!!

डर मुझे भी लगा फांसला देख कर
पर मैं बढ़ता गया रास्ता देख कर
खुद ब खुद मेरे नज़दीक आती गई
मेरी मंज़िल मेरा हौंसला देख कर !!

मंज़र धुंधला हो सकता है मंज़िल नहीं
दौर बुरा हो सकता है ज़िंदगी नहीं !!

हूँ चल रहा उस राह पर जिसकी कोई मंज़िल नहीं
है जुस्तजू उस शख़्स की जो कभी हासिल नहीं !!

Meri Manzil Shayari
Meri Manzil Shayari

मंजिल मिले या ना मिले ये तो
मुकद्दर की बात है हम कोशिश भी
ना करे ये तो गलत बात हैं !!

रास्ते कहां खत्म होते हैं ज़िन्दगी के सफ़र में
मंज़िल तो वही है जहां ख्वाहिशें थम जाएं !!

नहीं निगाह मे मंज़िल तो जुस्तजू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही !!

अपनी मंज़िल पे पहुँचना भी
खड़े रहना भी
कितना मुश्किल है बड़े हो के बड़े
रहना भी कितना मुश्किल है !!

जिस दिन से चला हूँ मेरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने अभी मील का पत्थर नहीं देखा !!

मंज़िल तो मिल ही जायेगी भटक कर ही
सही गुमराह तो वो हैं जो घर से
निकला ही नहीं करते !!

तू साथ चलता तो शायद मंज़िल मिल जाती
मुझे मुझे तो कोई रास्ता पहचानता नहीं !!

अगर दिलकश हो रास्ता
फिर तो फिकर ही नहीं है
ना मिले मंजिल ना सही
फिर भी जिन्दगी हंसीं है !!

रास्तों पर निगाह रखने वाले
भला मंज़िल कहाँ देख पाते हैं !!

सीढ़ी की आसानी तुम्हे मुबारक हो
मैंने अपनी दम पर मंज़िल पाई है !!

हम खुद तराशते हैं मंजिल के संग ए मील
हम वो नहीं हैं जिन को ज़माना बना गया !!

सामने मंज़िल थी और पीछे उस की आवाज़
रुकता तो सफर जाता चलता तो बिछड़ जाता !!

जिंदगी न मंज़िल में मिली और न राहों में मिली
ज़िन्दगी जब भी मिली तेरी ही बाहों में मिली !!

बढ़ते चले गए जो वो मंज़िल को पा गए
मैं पत्थरों से पाँव बचाने में रह गया !!

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